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Tuesday, July 21, 2026 9:02:35 AM

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केते कोल परियोजना के विस्तार पर रोक की मांग : बृंदा करात ने लिखा केंद्रीय मंत्री को पत्र

केते कोल परियोजना के विस्तार पर रोक की मांग : बृंदा करात ने लिखा केंद्रीय मंत्री को पत्र

रिपोर्ट : संजय पराते

नई दिल्ली। माकपा पोलिट ब्यूरो की पूर्व सदस्य और पूर्व सांसद बृंदा करात ने केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव को एक पत्र लिखकर छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य क्षेत्र में केते कोल परियोजना के विस्तार पर रोक लगाने की मांग की है। इस पत्र में उन्होंने इस मामले में दी गई मंजूरी का कड़ा विरोध करते हुए कहा है कि यह मंजूरी संबंधित ग्राम सभाओं की राय और संविधान व कानूनी ढाँचे के प्रावधानों की अनदेखी करके और स्थानीय समुदायों की ओर से सरकार को 1500 से ज़्यादा लिखित आपत्तियों को नजरअंदाज करके दी गई है।

अपने पत्र में माकपा नेता ने कहा है कि इस वन क्षेत्र में ओपन कास्ट माइनिंग से पहले ही हज़ारों पेड़ नष्ट हो चुके हैं और पानी और ज़मीन प्रदूषित हो चुकी है। अब आगे इस परियोजना के और विस्तार से 1742 हेक्टेयर घने वन भूमि से कम से कम 4.5 लाख पेड़ काटे जाएँगे। ये पेड़ घने जंगल में हैं, जहाँ कार्बन अवशोषण के लिए महत्वपूर्ण देशी पेड़ बहुतायत में हैं। इससे पहले से ही बुरी तरह प्रभावित इन क्षेत्रों में और भी ज़्यादा तबाही मच जाएगी और इस क्षेत्र के बाहर के कई गाँव भी इससे बुरी तरह प्रभावित होंगे।

बृंदा करात ने अपने पत्र में केंद्रीय मंत्री का ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित किया है कि केते एक्सटेंशन कोयला परियोजना को मंज़ूरी देने के पीछे कोई ‘जनहित’ नहीं है, जिसका दावा किया जा रहा है। उनका कहना है कि यह परियोजना राजस्थान सरकार के स्वामित्व वाली एक बिजली कंपनी को दी गई है, जिसने अडानी एंटरप्राइजेज के साथ मिलकर एक संयुक्त उद्यम स्थापित किया था, जिसमें अडानी की 74% हिस्सेदारी है। इस कंपनी को हसदेव-परसा कोयला परियोजना का एमडीओ (खनन विकास संचालक) नियुक्त किया गया था। इस बात के दस्तावेजी प्रमाण है कि इस परियोजना के अंतर्गत खनन किए गए कोयले की एक बड़ी मात्रा को ‘अस्वीकृत कोयला’ बताकर इसे निजी बिजली कंपनियों को बेच दिया गया है। इस प्रकार, यह परियोजना केवल निजी लाभ के लिए चलाई जा रही है और इसमें कोई जनहित नहीं है।

माकपा नेता ने ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के हवाले से केंद्रीय मंत्री के इस बयान की आलोचना की है कि वन अधिकार अधिनियम के कारण वन नष्ट हो रहे हैं। उन्होंने लिखा है कि वास्तविकता यह है कि विकास के नाम पर निजी खनन परियोजनाओं के कारण हमारे वन नष्ट हो रहे हैं और इन्हें कॉरपोरेटों से बचाने के लिए कड़े संरक्षण उपायों की आवश्यकता है। उनका कहना है कि हसदेव क्षेत्र के आदिवासियों ने एक बार फिर इस परियोजना का विरोध करके और पेड़ों तथा प्रकृति के विनाश को बचाने के अपने प्रयासों से साबित कर दिया है कि भारत में वनों के असली रक्षक वे ही हैं।

माकपा नेता बृंदा करात ने आशा व्यक्त की है कि केंद्रीय मंत्री निजी कंपनी के हितों को पूरा करने की जगह वनों, पेड़ों की अंधाधुंध कटाई तथा समृद्ध जैव-विविधता वाले क्षेत्र के विनाश को रोकने का काम करेंगे।

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