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Tuesday, July 21, 2026 10:57:54 PM

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इलाज के अभाव मे तड़प-तड़प कर मर गया पत्रकार का जवान बेटा, DM साहब की जांच पर उठे सवा

इलाज के अभाव मे तड़प-तड़प कर मर गया पत्रकार का जवान बेटा, DM साहब की जांच पर उठे सवा

वरिष्ठ पत्रकार अशफाक अहमद खाँ की कलम से

बहराइच । बहराइच की आबोहवा में ऑक्सीजन से ज्यादा इंसानियत घुली हुई है । तमाम सामाजिक ,धार्मिक व राजनीतिक असहमतियों के बावजूद हर किसी के दुख में सेवा भाव से खड़े रहना बहराइच की परंपरा रही है । जनप्रतिनिधि, व्यवसाई, अधिवक्ता, शिक्षक यहां तक कि प्रशासनिक अधिकारी भी संकट के समय प्रशासनिक बन्धनों को तोड़कर मानवता की सेवा के लिए आगे बढ़ते रहे हैं । बाढ़ की मार झेल रहे लोग हों ,शीतलहर में ठिठुरते शरीर हों , मरीजों के तमीरदारो की भूख हो या फिर कोरोना संकट । विपत्तियों के पंजे जब भी बहराइच को जकड़ने को आतुर हुए ,यहां के लोगों ने अपनी सामर्थ्य से पीड़ित लोगों को मुक्त कराया हैं । विपत्ति की आँच से मुरझाए चेहरों पर खुशी लाने के लिए बहराइच के लोगों ने समय-समय पर अपना दिल और बटुआ दोनों खोल कर रख दिए । कट्टर हिंदुत्ववादी कही जाने वाली संस्था कोरोना संकट के समय जब मुस्लिम इलाकों में जरूरत की वस्तुएं निशुल्क बांटते हैं ,जब गरीब अन्न रथ के सेवादार अस्पताल परिसर में भूख की शिद्दत झेल रहे किसी मौलवी साहब को प्यार व अपनत्व से भोजन परोसते हैं तो यह नजारे देख कर खुद मानवता भी मुस्कुरा उठती है । एहसास होता है कि औद्योगिक नजरिए से भले ही हमें लोग पिछड़ा कहें मगर मानवीय पैमाने पर हम सदियों से विकसित बने हुए हैं ।
इतनी शानदार मानवीय विरासत को संजोने के बीच बहराइच में कभी-कभार ऐसी भी घटनाएं घटित हो जाती हैं जो हमारी विरासत स्वरूप इंसानियत को तार-तार कर जाती है । सदियों खपा कर जिस इंसानियत की इमारत को बहराइच के लोगों ने बुलंदी दी उसकी बुनियाद को बहराइच के ही निष्ठुर , निर्दयी प्रशासन खोखला करने पर आमादा है । डर है कि यह निष्ठुरता कहीं पूरी इमारत को ही न गिरा दे ।
एक नौजवान अपने शहर और दुनिया को हमेशा के लिए इसलिए छोड़ गया ” क्योंकि” उसे इलाज की दरकार थी । “क्योंकि ” उसका परिवार आर्थिक तंगी से घिरा था । वह तड़प- तड़प कर मर गया “क्योंकि ” बहराइच के कलेक्टर का दिल मानवता के लिए नहीं बल्कि प्रशासन के लिए धड़कता था। उसकी मौत की चर्चा भी उसकी लाश के साथ दफन हो गई “क्योंकि ” वह एक पत्रकार का बेटा था ।
बहराइच के मोहल्ला घसियारीपुरा निवासी दीप प्रकाश श्रीवास्तव हिंदी दैनिक तरुण मित्र में जिला संवाददाता और मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं ।तीन बेटों और पति-पत्नी मिलाकर दीप प्रकाश का पाँच सदस्यों वाला परिवार खुशहाल जीवन जी रहा था ।जनवरी 20 20 से दीप के 18 वर्षीय मंझले बेटे स्नेहिल श्रीवास्तव पेट की गंभीर बीमारी से घिर गए । घर की जमा पूंजी स्नेहिल के इलाज में खर्च हो गई । पहले बीमारी फिर कोरोना संकट ने श्रीवास्तव परिवार की आय के सभी स्रोतों को बंद कर दिया । परिवार गंभीर आर्थिक तंगी से जूझ रहा था । रिश्तेदारों से कर्ज लेकर दीप प्रकाश बेटे स्नेहिल का इलाज लखनऊ में कराते रहें ।अप्रैल आते-आते स्नेहिल के स्वास्थ्य में आंशिक सुधार तो शुरू हुआ मगर इस दौरान कर्ज के पैसे भी इलाज में खर्च हो गए । एक तरफ बेटे स्नेहिल की भरी पूरी जिंदगी और दूसरी तरफ दीप प्रकाश के हाथ पूरी तरह खाली उस पर गैरतमंद और स्वाभिमानी ऐसे की करीबी दोस्तों से भी अपनी परेशानी नहीं बता सके । इलाज के अभाव में बेटे स्नेहिल के हर दिन कुम्हलाते चेहरे ने आखिरकार एक पिता को व्याकुल कर दिया । 4 अप्रैल 20को दीप प्रकाश ने जिला अधिकारी शंभू कुमार को प्रार्थना पत्र देकर उनसे मदद की गुहार लगाई। कुछ दिन बीतने के बाद भी जब डीएम कार्यालय से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई तो दीप प्रकाश ने अप्रैल में पुनः एक प्रार्थना पत्र देकर शंभू कुमार से मदद मांगी मगर डीएम साहब का रिस्पांस तब भी शून्य रहा । उधर बीमार स्नेहिल इलाज के अभाव में बिस्तर पकड़ चुका था । दीप प्रकाश मदद की उम्मीद लिए डीएम ,एडीएम, एसडीएम ऑफिस के चक्कर लगा रहे थे । स्नेहिल के बचने की आस हर दिन धूमिल होती जा रही थी । डीएम शंभू कुमार ने जब मदद करने से मुंह फेर लिया तो दीप प्रकाश ने मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिखी इस चिट्ठी पर जवाब देने को बाध्य शंभू कुमार ने सितंबर महीने में एसडीएम सदर सौरभ गंगवार को जांच करने के आदेश दिए फिर गंगवार साहब ने लेखपाल को आदेश थमा दिया । साहब लोगों ने जांच इतनी गहनता से किया कि दीप प्रकाश की वल्दियत ही गलत लिख दी । जांच रिपोर्ट शासन को भेज दी गई ।डीएम साहब संतुष्ट रहे होंगे कि उन्होंने अपने डीएम होने की जिम्मेदारी निभा दीॅ । बीमार स्नेही बिना इलाज के महीनों तड़पता रहा ।उसके माता-पिता हर सुबह इस उम्मीद के साथ उठते कि प्रशासन का दिल कभी तो पिघलेगा जब डीएम साहब स्नेहिल को मौत के मुंह से बचा लेंगे । दीप प्रकाश और उनके परिवार की यह उम्मीद, उम्मीद ही बनकर रह गई । 30 नवंबर 2020 की सुबह स्नेहिल हमेशा के लिए दुनिया से विदा हो गया। सात महीने से बेटे की जीवन की भीख मांग रही एक बेबस मां के आंसू भी डीएम शंभू कुमार के दिल को नहीं पसीज सके । स्नेहिल के मौत के चंद घंटों बाद ही दीप प्रकाश ने शंभू कुमार को मैसेज कर बताया कि उनके बेटे की मौत हो चुकी है ।चिकित्सीय मदद तो छोड़िए डीएम साहब दो शब्द अंतिम श्रद्धांजलि के भी नहीं लिख/बोल सके । एक कलेक्टर के दिल में कलेक्टरी से ज्यादा लोगों के लिए समर्पण, दया, करुणा, सहयोग की भावना जरूरी है। जीवन के मूल्य से बड़ा कोई नियम कानून नहीं हो सकता । यह बहराइच और प्रशासन दोनों का दुर्भाग्य है कि मदद के आभाव में उसका एक लाल दुनिया से असमय ही विदा हो गया ।
स्नेहिल जब भी स्मृतियों में याद आएगा तो एक कठोर कलेक्टर उन स्मृतियों से भुलाए नहीं जा सकेंगे ।

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