लखीमपुर खीरी I की अदालत के आदेश पर बरसोला कलां गांव के बगिया मोहल्ले में अब्दुल करीम की जमीन पर रह रहे परिवार अपने सिरों पर लटक रही बेदखली की तलवार से परेशान हैं। इसके साथ ही उनको इस बात का बड़ा अफसोस है कि उनके यकीन करने का बहुत बुरा सिला मिला।
जमीन पर रहने वाले परिवारों के मुताबिक उन्होंने अब्दुल करीम से रहने के लिए बरसों पहले प्लाट खरीदे थे। कुछ लोगों ने बयनामा भी करा लिया था लेकिन कई लोगों ने विश्वास के चलते स्टांप पेपर पर लिखापढ़ी करा ली थी। उसी की वजह से आज वे बेघर होने की कगार पर खड़े हैं। उन लोगों ने भी उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर कर इंसाफ की गुहार लगाई है। विवादित जमीन पर रहने वाले इस्तियाक बताते हैं कि उन्होंने 1970 में अब्दुल करीम से जमीन खरीदी थी। इसकी लिखापढ़ी स्टांप पेपर पर की गई थी जो उनके पास मौजूद है। उन्होंने बताया कि इसके आधार पर उन्होंने अदालत से इंसाफ की गुहार लगाई है। बुजुर्ग रहमत बताते हैं कि उन्होंने भी 1978 में अब्दुल करीम से जरिए बयनामा जमीन खरीदी थी। इतने सालों तक इस पर घर बनाकर रहने के बाद अब बेदखल होने की नौबत आ गई है। यहीं रहने वो शब्बीर बताते हैं कि 1983 में पड़ोस में बहने वाली मोहाना नदी की भयंकर बाढ़ का पानी गांव में भर जाने से तमाम लोगों के कागजात गल गए थे। उसका खामियाजा आज भुगतना पड़ रहा है। मुन्ना के कागज 1984 में गांव में लगी आग में अब्दुल करीम से खरीदी गई जमीन की लिखापढ़ी के कागज जल गए थे। अब जिस जमीन पर इतने सालों तक आशियाना बनाकर रहे, उससे उजड़ने की नौबत आने से रातों की नींद हराम है। यहां बसे लोग बताते हैं कि सन 1971 में अब्दुल करीम ने बरसोला कलां की विवादित जमीन किसी से खरीदी थी। 1974-75 में इसमें से प्लाट बेचे थे। कुछ लोगों ने बयनामा भी करवा लिया था। कुछ दिन बाद कुछ लोगों से अनबन के चलते अब्दुल करीम ने बेदखली का मुकदमा दायर कर दिया। कब्जेदारों के पैरवी न करने से अदालत से अब्दुल करीम के पक्ष में आर्डर हो गया। इसी बीच अब्दुल करीम की मौत के बाद उनके लड़के मोहर्रम अली ने मुकदमा चलाया। इसी मुकदमे में कब्जा दिलाने का आदेश किया गया है।
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