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Wednesday, October 21, 2026 12:34:15 AM

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जीवेत शरद: शतम’ आशीर्वाद या अभिशाप ?

जीवेत शरद: शतम’ आशीर्वाद या अभिशाप ?

रिपोर्ट : डॉ राजाराम त्रिपाठी

 

रेलवे की टिकिट में बूढे-बुजुर्गोंको मिलने वाली दी जाने वाली 50% की छूट भी विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था कहलाने वाली इस युवा-देश की युवा-सरकार को इतना ज्यादा अखर रही थी, कि इन्होंने सीनियर सिटीजंस को मिलने वाली इस छूट को भी बंद कर दिया।

 

 

परिवार अथवा वृद्धाआश्रमों में जिंदगी की गाड़ी को घसीट रहे उपेक्षित बुजुर्गों से अब सरकार ने भी मुंह फेर लिया है,क्योंकि ये संगठित बड़े वोट बैंक नहीं हैं,और सरकार के पास वोटो के थोक ध्रुवीकरण के ज्यादा कारगर व आजमाए गए सफल फॉर्मूले पहले से ही मौजूद हैं।

 

 

अगर हम अपने बुजुर्गों के लिए उपरोक्त जरूरी सुविधाएं मुहैया नहीं कर सकते तो हमें एक कल्याणकारी देश कहलाने का दंभ भरने का कोई अधिकार नहीं है। ऐसे में ‘सौ साल तक जियो’  का परंपरागत आशीर्वाद या  ‘जीवेत शरदः शतम’  जैसी शुभेच्छाएं सजा और अभिशाप बन के रह जाएंगी।

 

 

लेख :-

 

बुजुर्गों को समाज की सांस्कृतिक धरोहर माना जाता है। बुजुर्गों का सम्मान देना, उनकी उनकी सर्वविध सेवा करना आदि काल से ही भारतीय संस्कृति का प्रमुख अभिन्न अंग रहा है।

 

विश्व के अन्य देशों की तरह भारत अथवा इंडिया हर साल 21 अगस्त को आधिकारिक रूप से”वर्ल्ड  सीनियर सिटिजंस डे” यानि कि “विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस”  मनाता है। पहले इसका इतिहास समझते चलें। सर्वप्रथम अमेरिका में राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने 19 अगस्त 1988 को इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए और 21 अगस्त 1988 को संयुक्त राज्य में पहली बार “अंतर्राष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक दिवस” मनाया गया।

 

जबकि संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 14 दिसंबर 1990 को   ‘अंतरराष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक दिवस’ मनाने की घोषणा की, और पहली बार 1 अक्टूबर 1991 को ‘अंतर्राष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक दिवस’ मनाया ।

 

अब पहला सवाल यह उठता है की ‘वरिष्ठ नागरिक दिवस’  21 अगस्त को मनाया जाए,, अथवा 1 अक्टूबर को ?

 

और लीजिए, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2017 में  21 अगस्त को “आतंकवाद के पीड़ितों के स्मरण और श्रद्धांजलि के अंतर्राष्ट्रीय दिवस” के रूप में भी घोषित कर दिया गया।  बेचारे वृद्ध-जन “अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस”  के नाम पर साल में कम से कम एक दिन तो याद कर लिए  जाते थे। किंतु अब यह आतंकवाद पीड़ितों का मुद्दा इतना संवेदनशील है कि बेचारे वृद्ध-जनों  ने बिना चूं चपड़ किए चुपचाप इसे स्वीकार करने में ही अपनी भलाई समझी, और इस तरह  21 अगस्त पर वृद्धजनों का दावा तो लगभग खारिज ही हो गया।

 

इतने पर भी बस नहीं है। बहुसंख्य युवाओं के इस युवा देश को शायद ‘अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस’ स्मरण ही नहीं रहा, तभी तो इस साल 21 अगस्त को ” विश्व उद्यमिता दिवस” मनाया जा रहा है। इतना ही नहीं 21 अगस्त का यह उद्यमिता दिवस का कार्यक्रम  एकदिवसीय नहीं है । उद्यमिता दिवस के ये कार्यक्रम 21 अगस्त  से  2 अक्टूबर तक चलेंगे। यानी की 1 अक्टूबर वाला “अंतरराष्ट्रीय वृद्ध जन दिवस” के साथ ही  बेचारे लाल बहादुर शास्त्री जी और गांधीजी की जयंती भी इस  महान ‘युवा उद्यमिता दिवस अभियान’ की भेंट चढ़ने वाली है।  क्या अब अपनी लाइन बड़ा दिखाने के लिए दूसरे की लाइन मिठाना ही एकमात्र रास्ता बचा  है ?

 

विश्व वृद्धजन दिवस मनाने, उन्हें सम्मान देने, उनके सुखद बुढ़ापे की समुचित व्यवस्था करने की बात तो छोड़िए , पिछले काफी वर्षों से रेलवे की टिकिट में बूढे-बुजुर्गोंको मिलने वाली दी जाने वाली 50% की छूट भी,  विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था कहलवाने वाली इस युवा-देश की युवा -सरकार को इतना ज्यादा अखर रही थी, कि इन्होंने सीनियर सिटीजंस को  ट्रेन की टिकट में मिलने वाली इस छूट को भी बंद कर दिया। इस छूट के सहारे एक-एक पैसे को मोहताज बेचारे  बुजुर्ग माता-पिता नगरों-महानगरों में गुम हो चुके अपने बेटे-बेटियों ,रिश्तेदारों से कभी कभार मिल लेते थे।*

 

हमारा देश विश्व में सबसे युवा देश होने का दावा करता है, फिर ऐसे युवा देश में भला इन लाचार वृद्धजनों का क्या काम ? हालांकि सवाल यह भी उठना है कि क्या यह युवा कभी वृद्ध नहीं होंगे?

 

खैर  देश युवा है तो क्या यह सीनियर सिटीजंस इस देश पर बोझ बन गए हैं। क्या इसीलिए  भारत के वरिष्ठ नागरिक को  70 वर्ष के बाद चिकित्सा बीमा के लिए पात्र नहीं माना जाता है। मतलब यह हुआ कि 70 वर्ष के बाद वृद्ध जनों को बीमार होना ही मना है। 70 वर्ष के बाद  वृद्ध जनों से अपेक्षा की जाती है कि इस आयु सीमा को पार करने की पश्चात वे बिना अस्पताल और बीमा कंपनी का रुख किये अपने कर्म-फल के अनुसार सीधे स्वर्ग अथवा नरक का प्रस्थान करें। वृद्ध जनों के प्रति बीमा कंपनियों का रवैया देखते हुए देश के बैंकों वित्तीय संस्थानों ने भी बूढ़े बुजुर्गों से मुंह फेर लिया है। सत्तर साल की उम्र के बाद के  नागरिक किसी भी व्यापार उद्योग अथवा उद्यम के योग्य नहीं माने जाते। उन्हें ईएमआई पर ऋण भी नहीं मिलता है। भले आप कितने भी च्यवनप्राश खा लें, योगा कर लें, मैराथन दौड़ में फर्स्ट आ जाएं और युवाओं से भी ज्यादा  चुस्त दुरुस्त और फिजिकली मेंटली फिट क्यों ना हों, किंतु  70 साल की उम्र के बाद आपको ड्राइविंग लाइसेंस जारी नहीं किया जाएगा। भले ही बुजुर्ग कितने भी अनुभवी एवं कार्य के दृष्टिकोण से शारीरिक एवं मानसिक रूप से कितने ही स्वस्थ एवं उपयोगी हों किंतु सरकारी, अर्द्ध सरकारी सभी संस्थाओं में उनके लिए कोई काम नहीं है।

 

 

अन्य कई देशों में बुजुर्गों के लिए तरह-तरह की कल्याणकारी योजनाएं लागू हैं । प्रायः उन्हें निशुल्क यात्रा सुविधाएं, निशुल्क रहने की जगह, निशुल्क मोबाइल फोन सेवाएं, निशुल्क चिकित्सा, निशुल्क सामाजिक सुरक्षा आदि कई तरह की सुविधाएं और रियायतें दी जाती हैं।

 

आर्थिक-सामाजिक दबावों के चलते टूटते बिखरते संयुक्त परिवारों , तथा छोटे – छोटे फ्लैट्स कहलाने वाले दड़बों में रहने वाले एकल परिवारों में इन बुजुर्गों के लिए अब कोई जगह नहीं बची। परिवारों में उपेक्षित पड़े अथवा वृद्ध आश्रम में जिंदगी की गाड़ी को घसीट रहे इन बेचारे बुजुर्गों से अब सरकार ने भी मुंह फेर लिया है।  क्योंकि यह संगठित बड़े वोट बैंक नहीं हैं, और सरकार के पास वोटो के थोक ध्रुवीकरण के ज्यादा  कारगर तथा आजमाए हुए सफल फॉर्मूले पहले से ही मौजूद हैं।

 

 

अपने बुजुर्गों/ पुरखों के मरने के बाद भी उनका श्राद्ध करने वाला , पितृ पक्ष में  उनकी पूजा करने वाला हमारा समाज, और हमारी सरकार दोनों ही आज इस देश के बड़े बुजुर्गों, वृद्धजनों, सीनियर सिटीजंस को भुला बैठे हैं।

 

हमारे देश में तो रेलवे की टिकिट में सीनियर सिटीजन को मिलने वाली दी जाने वाली 50% की छूट भी इस युवा-देश की युवा-सरकार को इतना ज्यादा अखर रही थी कि इन्होंने में बूढ़े बुजुर्गों की रेलवे टिकट पर मिलने वाली छूट को भी बंद कर दिया।

 

बैंक को सहित कई संस्थानों में पेंशन या तो बंद कर दी गई है अथवा पेंशन का स्वरूप कुछ ऐसा बदल दिया कि अब अपने जीवन का सम्पूर्ण स्वर्ण काल समाज एवं देश की संस्थाओं को अर्पित कर चुका बूढ़ा लाचार बुजुर्ग अपने आप को इस समाज में अवांछित तथा ठगा हुआ पा रहा है।

 

दूसरी ओर देश की ताउम्र सेवा (?) करने को आतुर हमारे नेता गण, माननीय विधायक, सांसद महोदय प्रथम शपथग्रहण के साथ ही अपने मोटे वेतन, भत्ते , ताउम्र पेंशन एवं सारी पंचतारा सुविधाएं अपने जीवन के अंतिम दिनों तक के लिए सुरक्षित कर लेते हैं। इनके लिए तो ना अधिकतम लाभ लेने की कोई सीमा है,और  ना उम्र का कोई बंधन है। देश के बुजुर्गों को भले वाहन चलाने का लाइसेंस ना मिले  75 साल की उम्र में भी इन्हें देश को चलाने का लाइसेंस मिल जाता है।

 

हमारे देश की संविधान में इसे कल्याणकारी देश माना गया है। पर क्या हमारी सरकारें देश के वरिष्ठ नागरिकों को दी जाने वाली सुविधाओं के प्रति गंभीर हैं?  क्या सचमुच वरिष्ठ नागरिकों के लिए बनाई गई इनकी योजनाएं वरिष्ठ जनों के  जीवन को सहज सरल और सुविधापूर्ण बना पाई हैं?  जवाब पाने के लिए आपको शायद कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं है।

नौकरी पेशा तथा मध्यम वर्ग के लोग पूरी जिंदगी अपना पेट काटकर,अपनी इच्छाओं और सपनों से समझौता करके अपनी छोटी-छोटी  बचत को बैंक, डाकघर, जीवन बीमा में रखते हैं उस पर  ब्याज की दर घटते घटते महंगाई की वृद्धि दर से भी  कम हो गई है। हमारी मुद्रास्फीति के कारण मुद्रा के मूल्य में लगातार हो रही कमी के कारण के  इन बुजुर्गों की जीवन भर की कमाई  बैंकों में पड़े पड़े अपने आप सिकुड़ रही है और घटती जा रही है। ज्यादातर बुजुर्ग भी इस खामोश लूट से बेखबर हैं। जिन बुजुर्गों को पेंशन, किराया या पूर्व संचित सिक्योरिटी आदि कहीं से कुछ आय मिल भी रही है, उस पर भी मृत्यु पर्यन्त आयकर वसूला जाता है।

हमारा मानना है की आने वाले 2024 के चुनाव में राजनीतिक पार्टियों को अपने घोषणा पत्र में इससे संबंधित निम्न बिंदुओं को अनिवार्य रूप से स्थान देना चाहिए :-

1.  सभी नागरिकों को हर प्रकार की नौकरियों में बिना भेदभाव के ताउम्र पर्याप्त पेंशन का प्रावधान होना चाहिए।

 

2. सरकारी गैर-सरकारी पेंशन से वंचित 60 साल के ऊपर की स्त्री,पुरुष व थर्ड जेंडर समस्त नागरिकों को समुचित नियमित मासिक पेंशन दी जानी चाहिए।

 

3.सभी  वरिष्ठ नागरिकों को रेलवे बस हवाई जहाज तथा सभी पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम में निशुल्क यात्रा सुविधा पास दिया जाना चाहिए

 

4. सभी वरिष्ठ नागरिकों को जीवन पर्यंत बीमा अनिवार्य होना चाहिए एवं तत्संबंधी प्रीमियम का भुगतान सरकार द्वारा किया जाना चाहिए।

 

5. सभी वरिष्ठ नागरिकों के अदालती मामलों में शीघ्र निर्णय के लिए के लिए फास्ट ट्रैक की तर्ज पर विशेष न्यायालय की स्थापना की जानी चाहिए।

 

6. सभी वरिष्ठ नागरिक नागरिकों की लिए बिना भेदभाव हर शहर में सभी सुविधाओं तथा  जरूरी चिकित्सा सुविधाओं से निशुल्क आवास व्यवस्था की जानी चाहिए।

 

7. प्रत्येक अस्पताल में वरिष्ठ नागरिकों के लिए प्राथमिकता के आधार पर चिकित्सा, जांच,दवाई तथा बेड की व्यवस्था होनी चाहिए।

 

अगर हम अपने समाज के बुजुर्गों के लिए उपरोक्त जरूरी सुविधाएं मुहैया नहीं कर सकते तो हमें एक कल्याणकारी देश कहलाने का दंभ भरने का कोई अधिकार नहीं है। ऐसी स्थिति में तो बड़ों को प्रणाम की जवाब में ‘सौ साल तक जियो’  का परंपरागत आशीर्वाद या  ‘जीवेत शरदः शतम’  जैसी शुभेच्छाएं सजा और अभिशाप बन के रह जाएंगी।

 

लेखक :डॉ राजाराम त्रिपाठी, राष्ट्रीय संयोजक “अखिल भारतीय किसान महासंघ “(आईफा)

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