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Tuesday, October 20, 2026 9:45:22 PM

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युवाओं को मोदी का अनूठा टास्क : सेल्फी खेंचो –एप्प में डाल तमाशा देखो!

युवाओं को मोदी का अनूठा टास्क : सेल्फी खेंचो –एप्प में डाल तमाशा देखो!

रिपोर्ट : बादल सरोज

 

भाजपा के सुप्रीमो युगपुरुष मोदी जी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि देश की जनता जब उनसे प्रधानमंत्री – जिस रूप में वे शायद ही कभी रहे हों – के नाते खेत के बारे में कुछ जानना चाहती है, तब वे खलिहान की बात करते हैं ; जब जमीन पर धधकती आग के बारे में कुछ सुनना चाहते हैं, वे आसमान की बात करते हैं ; जब सवाल हिन्दुस्तान के होते हैं, तब वे पाकिस्तान की बात करते हैं । अगंभीर राजनीतिक प्रलाप, ढोंग और ढकोसले के उच्चतम स्वर में विलाप और अपनी ही जनता के बड़े हिस्से के खिलाफ उन्माद के हर दिन उच्च से उच्चतर होते आलाप के जो रिकॉर्ड उन्होंने अपने 10 साल के प्रधानमंत्री कार्यकाल में कायम किये हैं, उसकी मिसाल भारत तो दूर की बात रही, दुनिया के किसी भी देश में नहीं मिलती । मगर बनारस विश्वविद्यालय में हाल में दिया उनका भाषण खुद उनके ही अब तक के शोचनीय स्तर से भी काफी चिन्ताजनक स्तर का था। दुनिया और देश में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री जब शिक्षण संस्थाओं में, विश्वविद्यालयों में जाते हैं, तो ज्ञान की, विज्ञान की, दर्शन की, इतिहास की, दुनिया और समाज की नई नई जानकारियाँ देते हैं, पुरानी का नया भाष्य प्रस्तुत करते हैं। ऐसी नयी बातें बोलते हैं, जो न सिर्फ सुनने वालों की जानकारियाँ बढाते हैं, उन्हें समृद्ध करते हैं, बल्कि एक संग्रहणीय दस्तावेज के रूप में भविष्य में भी काम आते हैं। मोदी ऐसा करेंगे, ऐसी उम्मीद तो किसी को भी नहीं थी, मगर वे देश के इस प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के छात्र – छात्राओं के बीच मखौल करेंगे, यह भी शायद ही किसी ने सोचा होगा। वे यही कर रहे थे, बाकायदा उनके बीच घूम-घूम कर उन्हें सिखा रहे थे कि अपनी सेल्फी – स्वयं के मोबाइल से स्वयं के फोटो – कैसे लें और उन्हें खुद उनके नमो एप्प पर अपलोड कैसे करें, ताकि ए आई – आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस – के जरिये मोदी की हर फोटो के साथ वे अपनी फोटो देख सकें। जिस विश्वविद्यालय ने इंजीनियरिंग और चिकित्सा, दर्शन और साहित्य सहित हर विधा में देश को अनेक विद्वान व्यक्ति दिये हैं, उसके विद्यार्थियों को वे बनारस का गाइड बनने का कौशल विकसित करने की सलाह दे रहे थे, उन्हें हर हर शंभू का जाप करना सिखा रहे थे।

 

ये कलाकारियाँ वे उस बीएचयू में सिखा रहे थे, जिसके इसी कैंपस मे अभी चंद महीने पहले ही खुद उनकी पार्टी के युवा नेताओं, स्वयं मोदी की सांसदी वाली वाराणसी की महानगर भाजपा आई टी सैल से संयोजक कुणाल पाण्डेय, सह-संयोजक सक्षम पटेल और कार्यसमिति सदस्य आनन्द उर्फ़ अभिषेक चौहान ने आईआईटी की एक छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार किया था। बलात्कार के बाद तीनों बेफिक्र और ‘ब्रह्मा मेहरबान तो बन्दा पहलवान’ अंदाज में एकदम सुरक्षित आश्रय में मध्यप्रदेश में भाजपा के विधानसभा चुनाव अभियान को संभालने भोपाल पहुंच गए थे। बलात्कार पीड़िता और उसके परिजनों की ही नहीं, समाज के बाकी सभी लोगों की भी उम्मीद रही होगी कि इस जघन्य काण्ड की जगह पर बोलते हुए इस क्षेत्र का सांसद, जो देश का प्रधानमंत्री भी है, इसकी निंदा भर्त्सना का साहस भले न जुटा पाए, मगर पीड़िता के प्रति संवेदना तो जताएगा ही, लड़कों को ऐसे आचरण से दूर रहने की सलाह तो देगा ही : मगर “सेल्फी खेंचो –एप्प में डाल तमाशा देखो” वाले अपने भाषण में वे ऐसा कुछ भी नहीं बोले। बोलते भी कैसे? बनारस जिस यूपी में हैं, उसके चिन्मयानंद से लेकर कुलदीप सेंगर जैसे स्वनामधन्य बलात्कार आरोपी उन्हीं की पार्टी के शीर्ष नेताओं में हैं। जेल से ज्यादा पैरोल पर रहने वाले गुरमीत राम रहीम जैसे उनके दल के अंतरंगों में से हैं।

 

बोलने को तो वे उन युवाओं पर भी नहीं बोले, जिनकी बीसियों हजार की भीड़ से ठीक उसी दिन यूपी के सारे रेलवे स्टेशन पटे हुए। ये वे युवा थे, जो खूब तैयारी करके, आवेदन शुल्क के नाम पर सरकारी खजाने में करोड़ों रूपये जमा करके, मात्र 7 हजार पुलिस आरक्षकों की नौकरियों के लिए आधा करोड़ की संख्या में उस प्रतियोगी परीक्षा को देने जा रहे थे, जिसका पर्चा लीक हो चुका था। ए आई प्रशस्तिगान के क्रम में मोदी गर्व के साथ इसका भी उल्लेख कर सकते थे कि उनकी पार्टी ने मध्यप्रदेश से हरियाणा और उत्तरप्रदेश होते हुए देश भर में पर्चा लीक की मजबूत परम्परा ही विकसित नहीं की है – उसे ट्विटर और फेसबुक पर लीक करवा के आधुनिक आयाम भी दिया है। परीक्षा पर चर्चा के नाम पर किशोर और युवाओं को इम्तहान पास करने के गुर सिखाने वाले मोदी इन परीक्षार्थियों के बारे में एक शब्द नहीं बोले ; उन्हें पता था कि इन पर बोलेंगे, तो उस रोजगार पर भी बोलना होगा, जिसकी आस में ये 48 लाख मारे-मारे घूम रहे हैं और निराश होकर लौट रहे हैं। बात निकलेगी, तो पिछली आधी सदी में सबसे ज्यादा बेरोजगारी दर तक जायेगी, डिग्री और डिप्लोमाधारी इंजीनियरों को कुशल-अर्धकुशल मजदूरों के न्यूनतम वेतन के बराबर तनखा पर नौकरियों की पेशकश की भयावह स्थिति को भी सामने लायेगी। उन प्रतियोगी परीक्षाओं का जिकरा भी ध्यान में लाएगी, जो वर्षों पहले हो चुकीं, किन्तु उनमें चुने गए युवक-युवतियों को नियुक्ति पत्र अभी तक नहीं मिले। जिगर मुरादाबादी के शेर में कहें तो “तस्वीर के दो रुख़ हैं जाँ और ग़म-ए-जानाँ / इक नक़्श छुपाना है इक नक़्श दिखाना है।“ असली नक्श छुपाना है और नकली दिखाना है, तो उसके लिए स्वांग रचाना ही होता है। क्रोध का प्रबंधन करके उसे दूसरी तरफ धकेलना ही होता है।

 

यही काम बनारस में मोदी कर रहे थे, जब इस प्रसिद्ध शिक्षण संस्थान के मंच को अपनी सतही राजनीति की नुक्कड़ सभा के मंच में बदलते हुए अपने विरोधी दल के नेता के भाषण को सन्दर्भ से काटकर रखते हुए उसके खिलाफ अपने श्रोता छात्र-छात्राओं को भड़का रहे थे। “राहुल गांधी ने बनारस के युवाओं को नशेड़ी कहकर मेरी काशी, मेरी यूपी के युवाओं का अपमान किया है” का आरोप लगाते हुए उनमें उन्माद पैदा कर रहे थे। संदर्भ से काटकर बातों को रखना और उनके आधार पर अपने निष्कर्ष थोपना, उन्हें बार-बार दोहराकर, चीख-चीख कर, गा-बजा कर लोगों के बीच नफरत रोपने को कुछ लोगों द्वारा मोदी की वक्तृत्वकला कहा जाता है, यह उसकी ख़ास पहचान है। वे ऐसा बार बार, लगातार करते रहते हैं ; इस बार तो संसद में भी ऐसा करने से नही चूके, जब देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू के लालकिले के भाषण को ही संदर्भ से काटकर पेश कर दिया।

 

विश्व कथाओं में एक प्रसिद्ध कहानी एक ऐसे चित्रकार के बारे में है, जिसके बारे में यह मशहूर था कि वह जिसकी भी छवि उकेरता है, वह मर जाता है। बनारस में इकठ्ठा किये गए श्रोताओं के साथ बाकी युवाओं के लिए इसीलिये यह अतिरिक्त चिंता की बात है, क्योंकि चुनाव के ठीक पहले अचानक गले-गले तक भरा लाड़ दिखाते हुए मोदी इस बार युवाओं के लिए आये हैं। अब तक जहँ-जहँ पाँव पड़े हैं उनके, तहँ-तहँ बंटाधार ही हुआ है। जिनका नाम भी उन्होंने लिया, उसे डुबाकर ही दम लिया है ; किसान के प्रति हमदर्दी का ढोंग दिखाया, आज वह कहाँ खड़ा है, इसे बताने की जरूरत नहीं। मजदूरों को श्रमवीर बताया और सारे श्रम कानून काट-पीट कर उन्हें गुलामी की बेड़ियों में जकड़ दिया। महिलाओं की तारीफ़ में कसीदे पढ़े, नारी शक्ति को सराहा और सारे बलात्कारी एक हो का नारा देकर महिलाओं का जीना हराम करने वाले सभी को अपनी छतरी के नीचे इकठ्ठा कर लिया। भारतीय सेना की तारीफ़ की, पिछले चुनाव में तो उसी के नाम पर वोट भी मांगे, मगर पहली फुर्सत में ही अग्निवीर की योजना लाकर उसकी वाट लगाने से नहीं चूके। अब वे युवाओं के लिए आये हैं!!

 

“गाँठ से न दे भूसी – बातों से कर दे ख़ुशी” में दक्षता हासिल करने के लिए अनवरत रियाज करने वाले मोदी ने कहावतों को भी झाड़-पोंछकर, अदल-बदल कर अपने लायक बनाया हैं। ढपोर शंख और दंतनिपोर खोखली और कभी न पूरी होने वाली घोषणाओं के लिए इस्तेमाल किये जाने वाले शब्द थे, मोदी ने इन्हें निचोड़ शंख तक पहुंचाया है : मतलब यह कि जो कह रहे हैं, वह तो होगा ही नहीं, उसका ठीक उलटा अवश्य होगा। उन्होंने खुद अपने ही शब्दों को और आगे विकसित करते हुए पहले वायदों को जुमला बताया था, अब जुमलों को नया नाम देकर उन्हें मोदी की गारंटी कर दिया है।

 

इस सच्चाई को समझने के लिए काशी और बाकी देश के युवाओं को किसी एआई – नकली बुद्धिमत्ता – आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस की जरूरत नहीं है। अपने हर रोज के अनुभव से वह इन बातों को जानता समझता है। युवा भारत यह सब समझता है, यह जानकर ही हुक्मरान ज्यादा परेशान और घबराए दीखते है और उसे इधर-उधर उलझाने की तिकडम ढूंढते हैं, साजिशें रचते हैं। मगर काठ की हांडियां बार-बार नहीं चढ़ती – इस बार भी नहीं चढ़ेंगी।

 

लेखक ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं।

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