सृजन संवाद में गूंजा प्रतिरोधी साहित्य और संस्कृति का स्वर
विकल्प जन सांस्कृतिक मंच, मुहिम और श्रमजीवी विचार मंच का साझा आयोजन
कोटा। कोटा में छावनी के मांगलिक भवन हॉल में रविवार को विकल्प जन सांस्कृतिक मंच, मुहिम और श्रमजीवी विचार मंच के तत्वावधान में “सृजन संवाद” परिचर्चा आयोजित हुई। जिसका विषय कॉर्पोरेट-मनुवादी परिदृश्य में साहित्य, संस्कृति और वैचारिक प्रतिरोध की भूमिका था।
कार्यक्रम की शुरूआत प्रसिद्ध जनकवि हंसराज चौधरी ने श्रम वंदना से की। संयोजक महेन्द्र नेह ने कहा कि कॉर्पोरेट घराने अंतरराष्ट्रीय पूंजी के हित साध रहे हैं। जिससे अमीर-गरीब की खाई बढ़ रही है। अधिवक्ता दिनेश राय द्विवेदी ने चेतावनी दी कि कीर्तन, कथाओं और धार्मिक विवादों के जरिए सामाजिक चेतना को भटकाया जा रहा है। उन्होंने साहित्यकारों से गांव-गांव जाकर लोकतंत्र और समता की अलख जगाने का आह्वान किया। मुख्य अतिथि विजय सिंह पालीवाल ने अहंवाद और अवसरवाद को राजनीति व साहित्य की सबसे बड़ी बीमारी बताया। जिसने अर्थव्यवस्था और साहित्य की गरिमा को नुकसान पहुंचाया। जनवादी लेखक संघ के नागेन्द्र कुमावत ने प्रेमचंद, निराला और मुक्तिबोध की रचनाओं को गरीब-दलित वर्ग की आवाज़ बताया। नारायण शर्मा ने समाजवाद को पूंजीवाद का विकल्प बताया। जबकि हंसराज चौधरी ने साम्राज्यवाद के साम्प्रदायिकता और आतंकवाद से समझौते पर चिंता जताई। मुहिम के राजमल शर्मा ने साहित्यकारों से जीवन की सच्चाई लोगों तक पहुंचाने का आग्रह किया। प्रो. संजय चावला ने कविता के जरिए प्रतिरोध का स्वर बुलंद किया: “अब न मौन, न संकोच, सृजन बने प्रतिरोध, हो सच का जयगान।” परिचर्चा में कोटा और झालावाड़ के साहित्यकारों व विचारकों, जैसे विजय राघव, हाफिज राही, धनीराम समर्थ, आनंद हजारी और रामकरण प्रभाती ने भी विचार रखे।
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