शङ्कराचार्य अविमुक्तेश्वरानन्दः सरस्वती विक्रम संवत् २०८१ श्रावण कृष्ण द्वितीया दिल्ली । गुरु और शिष्य का सम्बन्ध संसार में सबसे अधिक विलक्षण होता है। शिष्य का सर्वांगीण हित केवल एक सच्चा गुरु ही चाहता है। मात- पिता आदि अन्य
गुरु के हितवाक्यों का संग्रह हैं विवेक चूडामणि


